तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस में प्रकृति एवं पर्यावरण

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्री रामचरितमानस में अद्भुत सामाजिक-राजनीतिक चित्रण के सदृश ही प्रकृति एवं पर्यावरण को भी हमारे जीवन का अभिन्न अंग होने के साथ जीवन को सुखी बनाने-रखने में इसकी अनिवार्यता तथा महत्व पर समुचित प्रकाश डाला गया है।  

By Nivedita Tiwari, Fellow, at Vision India Foundation

अद्भुत सामाजिक-राजनीतिक चित्रण के सदृश ही रामचरितमानस में प्रकृति एवं पर्यावरण को भी हमारे जीवन का अभिन्न अंग होने के साथ जीवन को सुखी बनाने-रखने में इसकी अनिवार्यता तथा महत्व पर समुचित प्रकाश डाला गया है। 

जब तुलसीदासजी बालकाण्ड में रामचरित मानस को –

“राम सीय जस सलिल सुधा सम…………………..पुरयिनि सघन चारु चौपाई……….” के पश्चात्  

“छंद सोरठा सुन्दर दोहा, सोइ बहुरंग कमलकुल सोहा” कहकर मानस के सीता-राम के यश की तुलना पवित्र सरोवर के अमृत-रुपी जल से और चौपाइयों की सुन्दर कमलिनियों से करते हैं तथा छंदों और दोहों आदि की सरोवर में खिले कमलों से करते हैं तो इसका आशय होता है कि प्रकृति-पर्यावरण में निहित ये वनस्पतियां हमारे जीवन में आनंद भरने के लिए उतना ही महत्वपूर्ण हैं जितना की मानस की चैपाइयां या दोहे।  

बालकाण्ड में वर्णित एक प्रसंग में प्रयाग स्थित गंगा-यमुना-सरस्वती के पवित्र संगम को विभिन्न सामाजिक आध्यात्मिक शैक्षिक दृष्टिकोणों से अत्यंत लोकोपकारी तथा उपयोगी कहा गया है। गोस्वामी जी कहते हैं कि  माघ के महीने में जब भगवान भास्कर मकर राशि पर जाते हैं तब बहुत सारे लोग तीरथराज प्रयाग आते हैं। वहां पर देवता, दैत्य किन्नर और मनुष्य सभी आदर पूर्वक त्रिवेणी (संगम) में स्नान करते हैं। वहां स्थित अक्षयवट का स्पर्श करके भगवान के श्री चरणों के स्पर्श का अनुभव प्राप्त करते हैं। तात्पर्य यह कि प्रयाग की भूमि, वन-उपवन, जलवायु, वनस्पतियां, समूचा पर्यावरण सब के लिए आकर्षक व रमणीय है, सभी को सुख-शांति प्रदान करने के साधनो से सुसम्पन्न है। ऐसी भूमि, ऐसा स्थान जहाँ विपरीत स्वाभाव तथा अलग-अलग वृत्ति-प्रवृत्ति के लोग भी विगत-वैर दीर्घावधि तक परस्पर सहयोग-साहचर्य के साथ प्रवास कर सकते हैं। 

इतना ही नहीं यह स्थान देश एवं समाज को प्रभावित करने वाले बहुआयामी विषयों पर गहन चिंतन-चर्चा के लिए भी अभीष्ट पाया गया है। 

विदित है कि ऋषि-मुनि अपने समय के उत्कृष्ट विचारक-चिंतक (Top Brains) माने गए हैं। प्रतिवर्ष माघ मास में वे भी प्रयाग जाते हैं, वहां स्थित भरद्वाज मुनि के आश्रम में संत समागम होता है, ज्ञान-विज्ञान पर चर्चा के साथ ही दर्शनशास्त्र, विधि-शास्त्र, समाज-शास्त्र और लोक-कल्याण जैसे विषयों पर भी गहन चिंतन होता है। इन बातों को आज के सन्दर्भ में देखें तो इनकी तुलना हम सर्दियों में होने वाली मेडिकल कॉन्फरेन्सेस से या राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व के अति महत्त्वपूर्ण विषयों पर होने वाले अधिवेशनो से कर सकते हैं। संक्षेप में कहें तो प्रयाग की भौगोलिक, जलवायविक व् पर्यावरणीय स्थिति ऐसे उच्चस्तरीय आयोजनों के लिए अत्यंत उपयुक्त मानी जाती थी।

“भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा…………………………

माघ मकरगति रवि जब होई, तीरथपतिहिं आव सब कोई।   

देव दनुज किन्नर नर श्रेनी, सदर मज्जहिं सकल त्रिवेणी।।

भरद्वाज आश्रम अति पावन, परम रम्य मुनिवर मन भावन।

तहाँ होइ मुनि रिषय समाजा, जाहिं जे मज्जन तीरथ राजा। 

ब्रह्म निरूपण धरम बिधि बरनहिं तत्त्व विभाग…………………… 

एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं, पुनि सब निज-निज आश्रम जाहीं।“

बालकाण्ड में ही वर्णित एक अन्य प्रसंग में ऋषि विश्वामित्र अपनी यज्ञ रक्षा हेतु राजा दशरथ से याचना करके उनके अति सुकुमार पुत्रों राम और लक्ष्मण को अपने आश्रम लाते हैं। वहां पर कोई राजसी व्यवस्था नहीं है, वह तो गहन वन में स्थित एक तपस्वी की तपोभूमि है, आश्रम है जहाँ जीवन-यापन वहां उपलब्ध वस्तुओं पर ही निर्भर है। अतः ऋषिवर भ्राता सहित प्रभु श्रीराम को आश्रम में सुगमता से सुलभ भोज्य पदार्थों – कंद, मूल, फलादि का ही भोजन कराते हैं।

“आयुध सर्ब समर्पि कै, प्रभु निज आश्रम आनि। 

कंद मूल फल भोजन, दीन्ह भगति हित जानि।.”    

ज्ञातव्य है यहां किसी तामसिक अथवा सामिष पौष्टिक भोजन की चर्चा नहीं है, न ही किसी विशिष्ट पौष्टिक भोजन की जिसे सेना लड़ाकों के लिए अथवा किसी खेल विशेष के प्रतिभागियों के लिए आवश्यक समझा जाता है। कुम्भकर्ण जैसे योद्धाओं का भोजन भी विशिष्ट था। जबकि भगवान या उनकी सेना शुद्ध शाकाहारी थी।कारण यही रहा होगा कि जल-वायु की शुद्धता के फलस्वरूप प्रकृति-प्रदत्त खाद्य पदार्थ – कंद-मूल-फल पौष्टिक और सुपोषित थे और मनुष्य के शरीर को हृष्ट-पुष्ट व् बलिष्ठ रखने हेतु पर्याप्त थे।  

आगे अयोध्याकाण्ड में चलें तो “उतरे राम देवसरि देखी, कीन्ह दंडवत हरष विसेषी। 

गंग सकल मुद मंगल मूला, सब सुख करनि हरनि सब सूला ।“

और इसके भी उपरांत

“मज्जन कीन्ह पंथ श्रम गयउ, सुचि जल पिअत मुदित सब भयऊ।

गिरि वन नदी ताल छवि छाये, दिन दिन प्रति सब होत सुहाए।   

खग-मृग वृन्द आनंदित रहहीं, मधुप मधुर गुंजत छवि लहहीं।“ 

कहकर यह इंगित किया गया है कि जब पर्याप्त वर्षा होती है और जलाशय, ताल-तलैयां, नदी-नाले (वाटर बॉडीज) पर्याप्त जल से भरे रहते हैं तो धरती सस्य-श्यामला होती है, वनस्पतियां समृद्ध होती हैं, धन-धान्य की प्रचुरता होती है और उन पर निर्भर सभी जीव-जंतु, पशु-पक्षी और उनके माध्यम से हम मनुष्य भी प्रसन्न रहते हैं।  

सीता की रक्षा में जटायु का बलिदान “गीधराज सुनि आरत बानी, रघुकुल तिलक नारि पहिचानी।”

और भगवान राम द्वारा अपने हाथों से उसका ससम्मान यथोचित संस्कार (मृतक कर्म) करना पशु-पक्षियों और मनुष्यों की परस्पर निर्भरता एवं एक-दूसरे के लिए उपयोगिता-आवश्यकता दर्शाकर पर्यावरणीय संतुलन की महत्ता भी बताता है। इसके साथ ही साथ जहाँ जटायु का व्यवहार किसी बेबस-लाचार की निःस्वार्थ सहायता पर जोर देता है तो श्रीराम का व्यवहार जीवन में उपकारी के प्रति कृतज्ञता की भावना की शिक्षा देता है।   

सेतुबंध के पूर्व भगवान राम द्वारा समुद्र से प्रार्थना करना – 

“यद्द्यपि तदपि नीति असि गाई, विनय करिय सागर सन जाई।  

प्रथम प्रणाम कीन्ह सिर नाई, बैठे पुनि तहँ दर्भ डसाई।” 

यह संदेश देता है कि हम प्रकृति के साथ मनमानी नहीं कर सकते। और यदि मनमानी करेंगे तो निश्तित रूप से प्रकृति हमारा साथ नहीं देगी और हमारा नुकसान होगा।                 

रामेश्वरम में सेतुबंध और शिवलिंग की स्थापना के पश्चात् भगवन राम का   

“जो गंगाजल लाइ चढ़इहहिं, सो सायुज्य मुक्ति नर पइहहिं” कहना जहाँ देवसलिला गंगाजी के जल को मोक्ष अर्थात जीवन का अनन्य परम सुख दिलाने वाला बताकर उनके संरक्षण की आवश्यकता पर दिया गया है, वहीँ अयोध्या आगमन पर “जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि, उत्तर दिसि बह सरयू पावनि” कहकर यह बताने की चेष्टा की गयी है कि हमारे गांव-नगरों की समृद्धि एवं रमणीयता में नदियों का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है या यों कहें कि अगर हमें जीवन में सुख-समृद्धि, सरसता-सुंदरता चाहिए तो नदियों का संरक्षण हमारी प्राथमिकताओं-प्रतिबद्धताओं में शामिल करना होगा।  

इस प्रकार हम पाते हैं कि श्रीरामचरितमानस के विभिन्न प्रसंगो में प्रकृति के विभिन्न अवययों – नदी, पर्वत, विभिन्न प्रकार की वनस्पति, जीव-जंतु, पशु-पक्षी आदि को देवी-देवताओं से जोड़कर तथा हमारे जीवन में उनकी उपयोगिता-आवश्यकता तथा महत्त्व को सिद्ध करके गोस्वामी जी ने पर्यावरण-संतुलन (इकोलॉजिकल बैलेंस) की आवश्यकता पर भी विशद रूप से प्रकाश डाला है। इसके साथ-साथ देश और समाज के लिए पर्यावरण की उपयोगिता-अनिवार्यता के कारण इसके संरक्षण की आवश्यकता पर भी पर्याप्त बल दिया है।

अंततः हम कह सकते हैं कि पर्यावरण के दृष्टिकोण से भी श्रीरामचरितमानस की प्रासंगिकता कालजयी है।

सैकड़ों वर्षो बाद भी यह अक्षुण्ण बनी हुयी है, इसमें कोई कमी नहीं आयी है। यह आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितना आज से लगभग पांच सौ वर्षों पूर्व थी।

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